करवा चौथ व्रत कथा-karva chauth vrat katha
करवा चौथ का व्रत हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व रखता है। यह व्रत सुहागन महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। karva chauth vrat katha का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों और लोक कथाओं में मिलता है। इस लेख में हम करवा चौथ व्रत कथा karva chauth vrat katha को विस्तार से जानेंगे और इसके महत्त्व को समझेंगे।करवा चौथ व्रत का महत्व
करवा चौथ का व्रत खासतौर पर उत्तर भारत में मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सुबह से लेकर रात तक उपवास करती हैं और चंद्रमा को देखकर व्रत तोड़ती हैं। इस पर्व में करवा चौथ व्रत कथा सुनने का भी विशेष महत्व है, जो व्रत को पूर्ण और सफल बनाती है।करवा चौथ व्रत karva chauth vrat katha की शुरुआत
करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी खाती हैं, जो उनकी सास द्वारा दी जाती है। सरगी खाने के बाद महिलाएं दिनभर अन्न और जल का त्याग करती हैं। शाम को पूजन कर चंद्र दर्शन के बाद व्रत का पारण करती हैं।इसे भी पढ़ें -samvidhan divas kab manaya jata hai? | Samvidhan Divas 2025 Full Guide
करवा चौथ व्रत कथा
करवा चौथ व्रत कथा karva chauth vrat katha के बिना इस पर्व की पूर्णता नहीं मानी जाती। पुरानी मान्यता के अनुसार, एक बार एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी। बेटी का नाम वीरावती था। जब वीरावती की शादी हुई, तो उसने पहली बार अपने पति की लंबी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। लेकिन व्रत के दौरान उसे बहुत तेज भूख और प्यास लगने लगी।उसके भाइयों ने देखा कि उनकी बहन बेहद कमजोर हो रही है, तो उन्होंने एक चाल चली। भाइयों ने एक पेड़ की ओट में दीप जलाकर चंद्रमा का आभास कराया और वीरावती को कहा कि चंद्रमा निकल आया है। वीरावती ने इसे सच मानकर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत तोड़ दिया। जैसे ही उसने व्रत तोड़ा, उसका पति गंभीर रूप से बीमार हो गया। तब एक साध्वी ने वीरावती को बताया कि उसने अधूरा व्रत तोड़ा है, जिसके कारण उसके पति की यह हालत हुई है। साध्वी ने वीरावती को पुनः करवा चौथ व्रत करने की सलाह दी। अगले वर्ष वीरावती ने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा और उसके पति स्वस्थ हो गए।

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